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Siddharthnagar News: पहले थे कंपाउंडर, अब बन गए मुन्ना भाई अस्पताल वाले

सिद्धार्थनगर। पहले झोलाछाप डिस्पेंसरी के कंपाउंर थे, ढाबा चलाते थे, अब ऐसे लोग मुन्ना भाई अस्पताल वाले बन चुके हैं। मैनेजमेंट के खेल में माहिर ये लोग स्वास्थ्य विभाग से साठगांठ कर मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कभी मरीजों की मौत की शिकायत होती है, तो ऐसे अस्पतालों को सील किया जाता है।

सिद्धार्थनगर जिले के तमाम अस्पतालों का हाल मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म जैसा है। न डॉक्टर की पढ़ाई की और कोई अनुभव भी नहीं, पर आज अस्पताल के मालिक हैं। रुतबा भी ऐसा है कि डॉक्टर भी इन्हें झुककर सर बुलाते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि मुन्ना भाई एमबीबीएस जैसी धमक बनाने वालों के पास डिग्री तो छोड़िए, छोटी कक्षा की पढ़ाई तक नहीं है। इनमें कोई हाईस्कूल फेल होकर छोटे-मोटे काम-धंधे करता था तो कोई पहले ड्रामा पार्टी में काम करता था। एक सज्जन तो ऐसे भी हैं, जो झोलाछाप के वहां कंपाउंडर थे। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन लोन लिया और अस्पताल खोल लिया। बिना डॉक्टर के इलाज के दौरान जच्चा-बच्चा की मौत हुई तो अस्पताल को बोर्ड उखाड़कर भाग गए। ऐसे कुछ मुन्ना भाई आजकल बहुत परेशान हैं।

कई अस्पतालों को कुछ माह पहले सील कर दिया गया था। इसके बाद भी ये मुन्ना भाई हिम्मत नहीं हारे हैं, उम्मीद लगाए बैठे हैं आज नहीं तो कल अस्पताल के सील का ताला टूटेगा जरूर और फिर से धंधे को बेखौफ शुरू करेंगे। हालांकि, कई मुन्ना भाई अभी पकड़ से दूर हैं और उनके अस्पतालों में मरीजों का जमकर शोषण हो रहा है। इलाज के नाम पर इन अस्पतालों में सिर्फ मरीजों को शोषण ही नहीं है, बल्कि मरीजों की मौत के बाद भी लूट खसोट होती है। ज्यादातर सील किए अस्पताल ऐसे हैं जहां लापरवाही में मरीजों की मौत हुई है या फिर इलाज के नाम पर मरीजों का शोषण गया। कई मुन्ना भाई अस्पताल का रजिस्ट्रेशन कराने को लेकर परेशान हैं।
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डॉक्टर के यहां थे पहले कंपाउंडर
डुमरियागंज में एक व्यक्ति ऐसा है, जो पहले एक डॉक्टर के यहां कंपाउंडर था। बाद में अपने नाम के आगे डॉक्टर लिखने लगा। इनके अस्पतालों में बड़े-बड़े डॉक्टरों के नाम के बोर्ड भी लगाए गए हैं। जबकि, ये डॉक्टर उसे अस्पतालों में इलाज के लिए जाते भी नहीं थे।

आशा के गठजोड़ से पनप रहे मुन्ना भाई
जिले में आशा कार्यकर्ताओं से गठजोड़ कर मरीजों को निजी अस्पताल में पहुंचाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ झोलाछाप भी मरीज निजी अस्पतालों में भेजकर रकम लेते हैं। सूत्र बताते हैं कि अगर मरीज की बड़ी सर्जरी है तो 10 से 12 हजार रुपये मुन्ना भाई देते हैं।

डॉक्टर के आगे से अब साहब गायब… क्षरण का यह सामाजिक प्रभाव
अब लोगों के सामाजिक सोच के केंद्र में लाभ व लोभ आ गया है। लोक कल्याण की अवधारणा लाभ कमाना नहीं है। डॉक्टर और शिक्षक दोनों ही पेशे से जुड़े लोगों का समाज में काफी सम्मान रहा है। दोनों का काम समाज निर्माण है। लेकिन, अब लोगों के दिमाग में पैसा कमाना बस गया है। चिकित्सा पेशा भी इससे अछूता नहीं है। हाल यह है कि जिसने डॉक्टर की पढ़ाई की नहीं है वह अस्पताल का मालिक है। डॉक्टर लोग पैसे के लालच में उनके पीछे हैं। यही कारण है कि अब चिकित्सकों का सम्मान भी घट गया है। पहले जहां लोग संबोधन के लिए डॉक्टर साहब का इस्तेमाल करते थे वहीं अब इसमें से साहब गायब हो गया है। यह शब्द गायब नहीं हुआ है बल्कि, इस पेशे में हुए क्षरण के सामाजिक प्रभाव काे दर्शाता है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान तो आम जनता का हुआ है। वैसे भी, अब देखा जाए तो अस्पताल शोषण की जगह बन गए हैं। इस शोषण में अधिकारी भी शामिल हैं। बिना उनके अस्पताल चल ही नहीं सकता है। अगर शासन-प्रशासन सख्ती बरते तो तभी अंकुश लग सकता है। जो लोग इसमें शामिल हैं उनकी प्रैक्टिस पर रोक लग जाए। परंतु एक बड़ा सवाल यह भी कि जिन्हें एक्शन लेना है वही इस खेल में शामिल हैं। ऐसे में सरकार पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह एक सख्त नियम बनाकर पालन कराए।
– प्रो. अभय कुमार श्रीवास्तव, प्राचार्य, बुद्ध विद्यापीठ महाविद्यालय

शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है। जिले में बगैर पंजीकरण के कोई अस्पताल संचालित नहीं है। समय-समय पर अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है। नियम का पालन करने वाले निजी अस्पताल ही जिले में संचालित हैं। जब भी शिकायत मिली, कड़ी कार्रवाई की गई।
– डॉ. बीके अग्रवाल, सीएमओ

केस एक
विद्या हॉस्पिटल बर्डपुर में एक बच्चे की मौत होने की शिकायत हुई तो स्वास्थ्य विभाग की टीम जांच करने पहुंची। 8-10 मरीज भर्ती थे, इनमें कई मरीजों की सर्जरी हुई थी। मौके पर एमबीबीएस डॉक्टर मौजूद नहीं थे। अस्पताल संचालक और सर्जन से बात की गई तो उनकी बातों में विभिन्नता पाई गई।

केस दो
जीवन हॉस्पिटल डुमरियागंज में इलाज के दौरान प्रसूता की मौत हो गई, उसके बाद बच्चे ने भी दम तोड़ दिया। इस मामले में शिकायत हुई तो स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच की। जांच के दौरान अस्पताल संचालक बोर्ड उखाड़कर भाग गया। इस मामले में एफआरआई हुई। इस मामले में कब्र से महिला का शव निकालकर पोस्टमार्टम किया गया।
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केस तीन
सेवा हॉस्पिटल बांसी सोनकर में इलाज के दौरान प्रसूता की मौत की मौत हो गई थी। इस मामले में शिकायत हुई तो स्वास्थ्य विभाग की टीम ने जांच की। मौके पर डॉक्टर व अस्पताल के मालिक नहीं मिले। इस मामले में एफआईआर दर्ज है।

केस चार
बांसी के जिगिनिहवा में दो मेडिकल स्टोर में जांच हुई थी, दोनों स्टोर में अल्ट्रासाउंड मशीनें मिलीं। इनमें एक मेडिकल स्टोर में गर्भपात में इस्तेमाल होने वाले उपकरण भी मिले थे। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दोनों के खिलाफ केस दर्ज कराया है।

इतने अस्पतालों का पंजीयन
स्वास्थ्य विभाग में निजी अस्पतालों का पंजीयन किया जा रहा है। निजी नर्सिंग होम व पैथोलॉजी के लिए 114 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें 45 अस्पतालों का लाइसेंस जारी किया गया है, जबकि 75 अल्ट्रासाउंड सेंटर का पंजीयन हुआ है। नोडल अधिकारी डॉ. एमएम त्रिपाठी ने बताया कि स्थलीय निरीक्षण के बाद ही निजी अस्पताल व अल्ट्रासाउंड सेंटर का लाइसेंस जारी किया जा रहा है।

चकाचौंध ने इलाज का खर्च बढ़ाया
15 से 20 साल पहले बड़े बिजनेसमैन अस्पताल संचालन में घुसे तो चकाचौंध का खेल शुरू हो गया। इसी चकाचौंध ने इलाज की कीमत को बढ़ा दिया। बिजनेसमैन के साथ काम करने वाले लोगों ने देखा कि इस काम में रुपये ज्यादा हैं तो उन्होंने इसे अपने पेशे के तौर पर अपना लिया और अस्पताल के धंधे में उतर आए। मरीजों को लगता है कि जहां पर अस्पताल में अच्छी रंगाई-पुताई और रंग-बिरंगी लाइटें होंगी, वहां इलाज अच्छा होगा। जबकि, मरीजों को डॉक्टरों का अनुभव देखना चाहिए और उसके बारे में पता करके ही इलाज के लिए जाना चाहिए। सामाजिक दृष्टि से अस्पतालों की शासन और प्रशासन को ग्रेडिंग करानी चाहिए, जिससे की मरीजों को सही जानकारी हो सके।

– डॉ. विमल द्विवेदी, महामंत्री, आईएमए

करोड़ों रुपये खर्च कर बन रहे डॉक्टर, वसूल रहे रुपये

1990 में जिले में इक्का-दुक्का नर्सिंग होम थे। सभी तरह के मरीज जिला अस्पताल और बीआरडी मेडिकल कॉलेज इलाज के लिए जाते थे। वहां पर मरीजों को निशुल्क इलाज मिलता था। कम पैसे में एमबीबीएस की पढ़ाई हो जाती थी। लेकिन, अब दौर बदल गया। निजी मेडिकल कॉलेज खुलने लगे और एक सीट की कीमत करोड़ाें रुपये में हो गई। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद सरकारी अस्पतालों में ऐसे डॉक्टरों को नौकरी नहीं मिल पा रही है। इन सबके बीच जो डॉक्टरों के यहां कर्मी का काम करते थे। उन्हें काम-काम करते थोड़ी जानकारी हुई तो उन्होंने अपने अस्पताल खोल लिए और नए-नए डॉक्टरों को पकड़कर मरीजों के शोषण में जुट गए। जबकि, पहले ऐसा नहीं था। डॉक्टर इलाज करते थे और मरीज भी उन्हें अपना भगवान मानते थे। अब स्थिति इतनी बदल गई है कि डॉक्टरों को भी लोग संदेह की नजर से देखते हैं।

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